दीवाली कार्तिक अमावस्या के दिन मनाई जाती है। यह पर्व भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, और इसका धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है। इस दिन देवी लक्ष्मी, धन, समृद्धि और सुख-शांति की देवी की पूजा होती है, और साथ ही भगवान गणेश, जो ज्ञान और समृद्धि के प्रतीक हैं, उनकी पूजा भी की जाती है। दीवाली के दिन घरों को दीपों से सजाया जाता है, मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं, और पूरे वातावरण में उत्सव और उल्लास का माहौल होता है।
दिनांक | दिन | त्योहार का नाम |
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29 अक्टूबर 2024 | मंगवार | धनतेरस |
31 अक्टूबर 2024 | बृहस्पतिवार | छोटी दिवाली |
1 नवंबर 2024 | शुक्रवार | बड़ी दिवाली |
2 नवंबर, 2024 | शनिवार | गोवर्धन पूजा |
3 नवंबर 2024 | रविवार | भाई दूज |
दिवाली 2024 लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त 1 नवंबर, 2024 शुक्रवार को शाम 05:36 से 06:16 तक रहेगा, यह कुल समय अवधि 41 मिनट की होगी।
दीवाली की तैयारी
दीवाली के दिन से पहले ही घरों की साफ-सफाई की जाती है। घर को चमकाया जाता है, दीवारों को चूने से पोता जाता है, और जिन्हें रंग करवाना हो, वे दीवारों पर रंग कराते हैं। देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्तियाँ तैयार की जाती हैं, जिन्हें पूजा के लिए घर में स्थापित किया जाता है। जिनके घर में रंग करवाना संभव न हो, वे गेरू (एक प्रकार का मिट्टी का रंग) का उपयोग करके लक्ष्मी जी और गणेश जी की तस्वीरें दीवारों पर बनाते हैं।
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पित्तरों और हनुमान जी की पूजा
दीवाली की शुरुआत में सबसे पहले पित्तरों (पूर्वजों) और हनुमान जी का ध्यान लगाया जाता है। माना जाता है कि पित्तरों की पूजा से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और घर में सुख-शांति का वातावरण बना रहता है। हनुमान जी की पूजा के पीछे यह मान्यता है कि वह सभी प्रकार की बुराइयों और नकारात्मक शक्तियों को दूर रखते हैं। इसके बाद घर के देवताओं की पूजा की जाती है।
लक्ष्मी पूजन की विधि
लक्ष्मी पूजन दीवाली के दिन का मुख्य अनुष्ठान होता है। इस दिन शाम के समय, लक्ष्मी जी और गणेश जी की मिट्टी की मूर्तियाँ बाज़ार से लाई जाती हैं। इन्हें घर में एक साफ जगह पर स्थापित किया जाता है। फिर पूजा की तैयारी शुरू होती है। पूजा के लिए विशेष सामग्री जुटाई जाती है, जिसमें जल, मोली, रोली, चावल, अबीर, गुलाल, फूल, नारियल, मिठाई, दक्षिणा, धूप-बत्ती, और दियासिलाई शामिल होती है।
दीयों का विशेष महत्व होता है। पूजा के समय दो कच्चे दीये, दो चारमुख वाले दीये, और तीस छोटे दीये रखे जाते हैं। इन दीयों में तेल और बत्ती डालकर उन्हें जलाया जाता है। लक्ष्मी पूजन के बाद इन दीयों को घर के सभी कमरों, रसोई, चौक, और सीढ़ियों में रखा जाता है, ताकि पूरे घर में प्रकाश फैल सके।
लक्ष्मी पूजा में पहले पुरुष पूजा करते हैं, और फिर स्त्रियाँ पूजा करती हैं। यह पूजा बहुत ही श्रद्धा और ध्यान के साथ की जाती है, क्योंकि लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने से घर में धन, समृद्धि, और सुख-शांति का वास होता है।
ब्राह्मण भोज और पितरों का अर्पण
पूजन के बाद, हलवा-पूरी और अन्य व्यंजनों की रसोई बनाई जाती है। एक थाली में ग्यारह पूरियों के साथ सभी प्रकार की सामग्री रखी जाती है और पितरों के नाम पर इसे अर्पित किया जाता है। यह सामग्री बाद में ब्राह्मण को दे दी जाती है। दीवाली पर ब्राह्मण भोज का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इसे पवित्र कर्म माना जाता है, जिससे परिवार पर देवताओं और पित्तरों की कृपा बनी रहती है।
धन और तिजोरी की पूजा
पूजा के दौरान तिजोरी (गल्ला) और व्यवसाय की भी पूजा की जाती है। व्यापार में समृद्धि और वृद्धि के लिए गणेश जी और लक्ष्मी जी को तिजोरी के पास स्थापित किया जाता है। पूजा के बाद तिजोरी में लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियों को रखकर धन की पूजा की जाती है, ताकि घर और व्यापार में निरंतर धन-धान्य की प्राप्ति होती रहे।
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रात के 12 बजे की पूजा
रात्रि के बारह बजे एक विशेष पूजा की जाती है। इस पूजा के लिए एक लाल कपड़ा बिछाकर गणेश-लक्ष्मी की एक जोड़ी मूर्ति रखी जाती है। पास ही रुपये, सवा सेर चावल, गुड़, केले, मूली, हरी गवार फली, दक्षिणा, और चार सुहाली रखकर इनका पूजन किया जाता है। इसके अलावा एक थाली में पाँच लड्डू रखकर गणेश जी का पूजन किया जाता है। दीवाली की रात को दीयों की निगरानी रखी जाती है, ताकि वे सारी रात जलते रहें। सुबह उठने के बाद इन दीयों को हटा लिया जाता है और चढ़ावे को मंदिर में अर्पित कर दिया जाता है।
लक्ष्मी जी की कहानी
दीवाली की रात को लक्ष्मी जी की कहानी सुनना भी एक विशेष परंपरा है। एक कहानी के अनुसार, एक साहूकार की बेटी हर रोज़ पीपल के पेड़ को सींचने जाती थी, जहाँ से लक्ष्मी जी निकलती थीं। एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से सहेली बनने का प्रस्ताव दिया। साहूकार की बेटी ने अपने पिता से परामर्श लिया और सहेली बनने के लिए सहमत हो गई। लक्ष्मी जी ने उसे शाल-दुशाला, सोने की चौकी और कई प्रकार के उपहार दिए। लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी को अपने घर आने का निमंत्रण दिया, जिसे उसने स्वीकार कर लिया।
लक्ष्मी जी के यहाँ जाकर, साहूकार की बेटी को बहुत से आभूषण और छत्तीस प्रकार के भोजन मिले। इसके बाद लक्ष्मी जी ने भी साहूकार की बेटी के घर आने का वादा किया। साहूकार की बेटी ने अपने घर में सफाई कर लक्ष्मी जी की अगवानी की। लक्ष्मी जी ने उसे धन-धान्य से भर दिया और उसके घर को समृद्धि से परिपूर्ण कर दिया।
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धन और समृद्धि का आशीर्वाद
दीवाली की पूजा और अनुष्ठान धन और समृद्धि का प्रतीक हैं। लक्ष्मी जी की कृपा से परिवार में धन-धान्य की वृद्धि होती है और जीवन में सुख-शांति का वास होता है। दीवाली की पूजा को जितनी श्रद्धा और ध्यान से किया जाता है, उतनी ही अधिक कृपा और आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
प्रातःकाल का अनुष्ठान
दीवाली की रात के बाद, प्रातःकाल चार बजे उठकर पुराने छाज में कूड़ा रखकर एक बेलन से छाज बजाया जाता है। इस प्रक्रिया में कहा जाता है, “लक्ष्मी आओ, लक्ष्मी आओ, दरिद्र जाओ, दरिद्र जाओ।” यह अनुष्ठान दरिद्रता और नकारात्मकता को घर से बाहर निकालने और समृद्धि को आमंत्रित करने के लिए किया जाता है।
दीवाली का समापन
दीवाली के समापन के बाद, सभी महिलाएँ अपने सास और ननद के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें रुपये व लड्डू अर्पित करती हैं। यह पारिवारिक संबंधों में मिठास और एकता का प्रतीक होता है। दीवाली का यह अनुष्ठान पूरे परिवार में प्रेम, सहयोग और समृद्धि का वातावरण बनाता है।
बड़ी दीवाली केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि धन, समृद्धि और सुख-शांति की प्राप्ति केवल धार्मिक अनुष्ठानों और श्रद्धा से संभव है। दीवाली की पूजा हमें यह भी याद दिलाती है कि नकारात्मकता और दरिद्रता को दूर करके, सकारात्मकता और समृद्धि को अपने जीवन में कैसे आमंत्रित किया जाए।
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