आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा का पर्व मनाया जाता है, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना के साथ ही परंपरागत विधि से पूजा की जाती है। दशहरे के दिन लोग शस्त्र-पूजन, शमी वृक्ष का पूजन और श्रीराम का पूजन करते हैं। यह दिन शक्ति, विजय और शत्रुओं पर विजय की प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
दशहरा 2024 तिथि, दिन और पूजा का समय
तिथि | 12 अक्टूबर 2024 |
दिन | शनिवार |
पूजा का शुभ मुहूर्त | दोपहर 2:00 बजे से 2:48 तक |
इसे जरूर पढ़ें: पंच-देवों की पूजा और हिन्दू धर्म के मुख्य नियम
पूजा की सामग्री और विधि
दशहरे की पूजा के लिए कुछ विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है। इनमें आटा, जल, रोली, चावल, मौली, गुड़, दक्षिणा, फूल, और जौ के झंवारे शामिल हैं। सबसे पहले आटे से मंडप तैयार करें और उसमें दशहरा (स्थापना) करें। दशहरे के ऊपर जल, रोली, चावल, मौली, गुड़, दक्षिणा, और फूल चढ़ाएँ। पूजा के समय सेर में से एक स्थान पर एक नगद रुपया और झंवारे रखें, दूसरे स्थान पर फल, रीली, और चावल चढ़ाएं।
कुछ समय बाद उस स्थान से रुपये को निकालकर अलमारी में सुरक्षित रख दें। फिर बही-खाते की पूजा की जाती है। बड़ी (कॉपी) में सतिया (स्वस्तिक) बनाकर उस पर जल, फूल, रोली, और चावल चढ़ाएँ। थोड़े से झंवारे भी चढ़ाएं और फिर से दशहरे की पूजा करें। बही-खातों की पूजा के बाद दवात और कलम का पूजन करें, जो व्यापार में सफलता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन हलवा, पूरी और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी और रामायण की पूजा की जाती है। यह पूजा परिवार की समृद्धि और जीवन में विजय प्राप्ति के लिए की जाती है। श्रीराम की कथा पढ़कर या सुनकर उन्हें भोग लगाया जाता है।
इसे जरूर पढ़ें: मां दुर्गा के 108 नाम
दशहरे की कथा
एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, “हे महादेव! दशहरे का त्योहार क्यों मनाया जाता है, और इसका क्या महत्व है?” तब भगवान शिव ने उत्तर दिया, “आश्विन शुक्ल दशमी के दिन सायंकाल के समय विजय नामक शुभ मुहूर्त होता है, जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला होता है। इस समय राजा या युद्ध के इच्छुक व्यक्ति को शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रस्थान करना चाहिए।”
भगवान शिव ने यह भी बताया कि इस दिन यदि श्रवण नक्षत्र का योग हो, तो यह और भी शुभ माना जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने इसी विजयकाल में लंका पर चढ़ाई की थी और रावण का वध किया था। इसीलिए दशहरा त्योहार विजय और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। क्षत्रिय वर्ग इस दिन को विशेष रूप से मनाता है, क्योंकि यह उनकी शौर्य और वीरता का पर्व है।
इस दिन अगर शत्रु से युद्ध का प्रसंग न हो, तो भी राजाओं को अपनी सीमा का उल्लंघन करना चाहिए और सुसज्जित होकर शमी वृक्ष का पूजन करना चाहिए। शमी का वृक्ष विजय का प्रतीक है, जो शत्रुओं का नाश करने और पापों को दूर करने में सहायक माना जाता है।
शमी वृक्ष की महत्ता
पार्वती जी ने पूछा, “हे महादेव! शमी वृक्ष ने अर्जुन का धनुष कब और क्यों धारण किया था, और श्रीरामचंद्रजी से क्या प्रिय वाणी कही थी?”
तब भगवान शिव ने उत्तर दिया, “जब पांडवों को दुर्योधन ने जुए में हराकर 12 वर्षों के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास की शर्त पर भेजा था, तब अर्जुन ने अपना धनुष और बाण शमी वृक्ष पर छिपाकर रख दिए थे। जब अज्ञातवास का समय समाप्त हुआ और विराट राजकुमार गौओं की रक्षा के लिए अर्जुन को ले गया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने शस्त्रों को उठाया और शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। इसलिए शमी वृक्ष को वीरता का प्रतीक माना जाता है।”
विजयदशमी के दिन जब श्रीरामचंद्रजी लंका पर चढ़ाई करने के लिए निकले, तब शमी वृक्ष ने उन्हें आशीर्वाद स्वरूप प्रिय वाणी कही थी, “हे राम! आपकी विजय होगी।” इसीलिए विजय दशमी के दिन शमी वृक्ष की पूजा की जाती है।
राजा युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण संवाद
एक बार राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से विजय दशमी के पर्व का महत्व पूछा। तब श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन! विजय दशमी के दिन राजा को विशेष रूप से सुसज्जित होकर अपने हाथी, घोड़ों, और शस्त्रों का पूजन करना चाहिए। इस दिन राजाओं को अपने पूरोहित के साथ पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान करना चाहिए, जहाँ उन्हें वास्तु-पूजा करनी चाहिए और अष्ट- दिग्पालों (आठ दिशाओं के संरक्षक देवताओं) और पार्थ देवता (शस्त्र देवता) की वैदिक मंत्रों से पूजा करनी चाहिए। इसके बाद, शत्रु की प्रतिकृति बनाकर उसकी छाती में बाण लगाना चाहिए और वेदमंत्रों के साथ शत्रु पर विजय प्राप्ति की कामना करनी चाहिए।”
इस पूजा के बाद राजा को अपने अस्त्र-शस्त्रों का निरीक्षण करना चाहिए और फिर वापस अपने महल में लौट जाना चाहिए। इस विधि से पूजा करने वाला राजा सदैव शत्रु पर विजय प्राप्त करता है और उसके राज्य में समृद्धि और शांति बनी रहती है।
दशहरे का पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन में विजय, शक्ति, और साहस का प्रतीक है। इस दिन की पूजा-अर्चना न केवल शारीरिक और मानसिक शक्ति की वृद्धि करती है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और विजय प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
इसे जरूर पढ़ें: स्वस्तिक, 9 निधियाँ और ऋद्धि-सिद्धि का महत्व
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। यह सामग्री विभिन्न स्रोतों से संकलित की गई है और इसे केवल जानकारी के रूप में लिया जाना चाहिए। ये सभी बातें मान्यताओं पर आधारित है | adhyatmiaura.in इसकी पुष्टि नहीं करता |
Leave a Reply