नवरात्र का विधान और महत्व

नवरात्र का विधान और महत्व

नवरात्र हिंदू धर्म में एक पवित्र पर्व है, जो देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के लिए मनाया जाता है। इस दौरान भक्त देवी की कृपा पाने के लिए व्रत रखते हैं, मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और विशेष नियमों का पालन करते हैं। नवरात्र का विधान बहुत ही सरल होते हुए भी धार्मिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

देवी जी की स्थापना और पूजा

नवरात्र का प्रारंभ देवी की प्रतिमा या तस्वीर की स्थापना से होता है। यदि कोई देवी की तस्वीर नहीं बना सकता, तो वह देवी की फोटो एक ऊंचे पटरे पर स्थापित कर सकता है। तस्वीर या प्रतिमा को सफेद वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। इसके साथ गणेश जी की स्थापना होती है। पूजा स्थल पर चावल की नौ ढेरी और लाल रंगे की सोलह ढेरी बनानी होती है, जिससे नवग्रह और षोडशमातृका का प्रतिनिधित्व किया जाता है।

कलश की पूजा के बाद नौ दिनों तक देवी की नियमित पूजा की जाती है। देवी को जल, मौली, रोली, चावल, सिन्दूर, गुलाल, प्रसाद, फल, फूल और धूप-दीप के साथ पूजा जाता है। देवी की आरती करके विशेष ध्वजा, ओढ़नी, और दक्षिणा अर्पित की जाती है। इस पूजा के अंतर्गत ज्योति प्रज्वलित करनी चाहिए, जो नौ दिनों तक निरंतर जलती रहनी चाहिए।

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देवी के कुमारी पूजन और कन्याओं का भोजन

नवरात्र के दौरान कुमारी पूजन का विशेष महत्व होता है। अष्टमी के दिन देवी जी के कड़ाही का आयोजन किया जाता है, जिसमें हलवा, पूरी और ज्योति जलाकर नौ कुमारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है। इस समय सभी कन्याओं को टीका लगाकर उपहार और दक्षिणा देनी चाहिए। विशेषकर जो कन्या रोज पूजा में उपस्थित होती है, उसे साड़ी और ब्लाउज के साथ अतिरिक्त दक्षिणा दी जाती है।

दुर्गा पाठ और ब्राह्मण भोज

पूरे नवरात्र में नौ दिनों तक देवी दुर्गा का पाठ किया जाता है, जिसे एक पंडित द्वारा कराना श्रेयस्कर माना जाता है। इसके साथ-साथ ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा है, जिससे नवरात्र व्रत का पुण्यफल और भी अधिक होता है। व्रत रखने वाले व्यक्ति के लिए यह आवश्यक होता है कि वह देवी की कृपा पाने के लिए ब्राह्मणों और कन्याओं को आदरपूर्वक भोजन कराएं।

विशेष पूजा सामग्री

यदि नवरात्र के दौरान कोई काली जी या देवी जी के दर्शन करने जाएँ, तो उन्हें पूजा की सामग्री साथ ले जानी चाहिए। इसमें जल, रोली, चावल, मौली, दही, दूध, चीनी, फल, प्रसाद, चूड़ी, सिन्दूर, ध्वजा, धूप, दीपक और नारियल शामिल होते हैं। देवी को इन सभी सामग्री के साथ अर्पण करना अति शुभ माना जाता है, साथ ही दक्षिणा भी अवश्य चढ़ानी चाहिए।

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नवरात्र व्रत की पौराणिक कथा

प्राचीन काल में, एक शक्तिशाली राजा सुरथ थे। उन्होंने अपने राज्य को बखूबी संभाला था, लेकिन एक दिन शत्रु उन पर आक्रमण कर देते हैं। राजा के मंत्रियों ने विश्वासघात किया और शत्रु के साथ मिलकर राजा को पराजित कर दिया। राजा दुःखी तथा निराश होकर तपस्वी वेष में वन में निवास करने लगे। उसी वन में उन्हें समाधि नाम का वैश्य मिला, जो अपने स्त्री एवं पुत्रों के दुर्व्यवहार से अपमानित होकर वहाँ निवास करता था। दोनों में परस्पर परिचय हुआ। वे महर्षि मेधा के आश्रम में पहुँचे। महामुनि मेधा के द्वारा आने का कारण पूछने पर दोनों ने बताया कि, यद्यपि हम दोनों अपने लोगों से ही अत्यन्त अपमानित तथा तिरस्कृत हैं फिर भी उनके प्रति मोह नहीं छूटता, इसका क्या कारण है? महर्षि मेधा ने बताया कि मन शक्ति के अधीन होता है। आदि शक्ति भगवती के दो रूप हैं–विद्या और अविद्या । प्रथम ज्ञान स्वरूपा हैं तथा दूसरी अज्ञान स्वरूपा । जो अविद्या (अज्ञान) के आदिकारण रूप में उपासना करते हैं, उन्हें विद्या-स्वरूपा प्राप्त होकर मोक्ष प्रदान करती हैं। राजा सुरथ ने पूछा- देवी कौन हैं और उनका जन्म कैसे हुआ? महामुनि बोले- राजन्! आप जिस देवी के बारे में प्रश्न पूछ रहे हैं, वह समस्त जगत की जननी सर्व व्यापक हैं। ‘कालचक्र के अनुसार कल्पांत के समय हमेशा महा प्रलय होती है। उसी समय की बात है जब श्रीहरि क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा मे शयन कर रहे थे तभी उनके दोनों कानों से 2 दैत्य मधु और कैटभ उत्पन्न हुए और श्रीहरि की नाभि-कमल से उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा को मारने दौड़े। उनके इस भयानक रूप को देखकर ब्रह्माजी ने अनुमान लगाया कि विष्णु के सिवा मेरी कोई शरण नहीं । किन्तु भगवान इस अवसर पर सो रहे थे। तब विष्णु भगवान को जगाने हेतु उनके नयनों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब अधिष्ठात्री देवी श्रीहरि के आँख, नाक, मुख तथा हृदय से निकलकर परामपिता ब्रह्मा की रक्षा हेतु उनके सामने खड़ी हो गई। योगनिद्रा का स्वयं से बहार निकलते ही विष्णु भगवान जाग उठे। श्रीहरि तथा उन दोनों राक्षसों में 5 हजार वर्षों तक युद्ध हुआ। अन्त में वे दोनों भगवान विष्णु द्वारा मारे गये। ऋषि बोले- अब ब्रह्माजी की स्तुति से उत्पन्न महामाया देवी की वीरता सुनो। एक बार देवताओं तथा राक्षसराज महिषासुर में सैंकड़ों वर्षों तक घनघोर युद्ध हुआ। इस युद्ध में देवराज इन्द्र की हार हुई और असुरराज महिषासुर इन्द्रलोक का स्वामी बन गया। तब हारे हुए देवगण ब्रह्माजी को आगे करके भगवान शंकर तथा विष्णु के पास गये और उनसे अपनी व्यथा-कथा कही । देवताओं की इस दुर्दशा को देखकर विष्णु तथा शंकर क्रोधित हो गए। तब श्रीहरि के मुख तथा ब्रह्मदेव, शंकर, इंद्रदेव आदि के शरीरों से एक दिव्य तेज निकला, जिससे चारों दिशाएँ प्रकाशित होने लगी। अन्त में यही तेज एक देवी के रूप में परिणत हो गया। देवी ने सभी देवताओं से आयुध, शक्ति तथा आभूषण प्राप्त कर उच्च स्वर से अट्टहासयुक्त गगनभेदी गर्जना की जिससे तीनों लोकों में हलचल मच गई। क्रोधित महिषासुर दैत्य सेना का व्यूह बनाकर इस सिंहनाद की ओर दौड़ा। उसने देखा कि देवी की प्रभा में तीनों देव अंकित हैं। महिषासुर अपना समस्त बल, छल-छद्म लगाकर भी हार गया और देवी के हाथों मारा गया। आगे चलकर यही देवी शुम्भ तथा निशुम्भ नामक असुरों का वध करने के लिए गौरी देवी के रूप में उत्पन्न हुई। इन सब व्याख्यानों को सुनाकर मेधा ऋषि ने राजा सुरथ तथा वणिक समाधि से देवी-स्तवन की विधिवत् व्याख्या की। इसके प्रभाव से दोनों एक नदी-तट पर जाकर तपस्या में लीन हो गए। तीन वर्ष बाद दुर्गाजी ने प्रकट होकर उन दोनों को आशीर्वाद दिया। जिससे वणिक सांसारिक मोह से मुक्त होकर आत्म-चिंतन में लग गया तथा राजा ने शत्रुओं को जीतकर अपना खोया राज-वैभव पुनः प्राप्त कर लिया।

नवरात्र व्रत का सार

नवरात्र व्रत केवल देवी की कृपा प्राप्त करने का साधन ही नहीं है, बल्कि यह आत्मशक्ति, संयम, और धर्म के प्रति श्रद्धा को बढ़ाता है। नवरात्र के दौरान भक्तगण देवी की उपासना करते हुए अपने भीतर की बुरी शक्तियों को परास्त करने का प्रयास करते हैं। यह पर्व न केवल आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है, बल्कि सामूहिक रूप से शक्ति, विश्वास, और समर्पण का प्रतीक भी है।

नवरात्र व्रत की समाप्ति

नवरात्र के अंत में देवी की पूजा के साथ ही उद्यापन की विधि की जाती है। इस दिन विशेष पूजन करके ब्राह्मणों और कन्याओं को दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट किया जाता है। देवी को प्रसन्न करने के लिए भक्तों द्वारा किये गए इस उपासना और व्रत का फल न केवल वर्तमान जीवन में, बल्कि परलोक में भी अक्षय सुख और शांति प्रदान करता है।

नवरात्र व्रत का पालन भक्तों के जीवन में शक्ति, साहस, और समृद्धि लाता है। यह नौ दिनों का पर्व, देवी की कृपा और आशीर्वाद पाने का सबसे उत्तम अवसर है, जो जीवन को सकारात्मक ऊर्जा और दिशा प्रदान करता है।

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