निर्जला एकादशी हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे श्रद्धालु बड़ी आस्था और भक्तिभाव से करते हैं। इस दिन व्रत करने वाले को जल भी नहीं पीना होता है। अगर बिना खाए रहना संभव न हो, तो फलाहार के साथ व्रत किया जा सकता है। एकादशी के दिन एक मटके में जल भरकर, उसे ढक्कन से ढक देना चाहिए। इस ढक्कन पर चीनी, दक्षिणा, और फल आदि रखकर भगवान को अर्पित करना चाहिए।
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निर्जला एकादशी की कथा
एक समय की बात है, पांडवों में से भीमसेन ने ऋषि वेदव्यास से कहा, “भगवन! मेरे भाई युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और माता कुन्ती व द्रौपदी सभी एकादशी का व्रत रखते हैं और मुझसे भी इस व्रत को करने के लिए कहते हैं। लेकिन मैं भूख सहन नहीं कर सकता। मैं दान देकर और वासुदेव भगवान की पूजा करके उन्हें प्रसन्न कर सकता हूँ। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे बिना व्रत किए ही मुझे एकादशी व्रत का फल मिल सके।”
ऋषि वेदव्यास ने उत्तर दिया, “भीमसेन! यदि तुम स्वर्ग की कामना रखते हो और नरक से बचना चाहते हो, तो तुम्हें दोनों एकादशियों का व्रत करना होगा।” भीमसेन ने कहा, “हे ऋषिवर! मेरे लिए एक समय का भोजन करना भी कठिन है। मेरे पेट में वृक नामक अग्नि हमेशा जलती रहती है, जिससे मेरा भूख कभी शांत नहीं होती। कृपया मुझे ऐसा व्रत बताइए जिससे मेरा कल्याण हो सके।”
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इस पर ऋषि वेदव्यास ने कहा, “हे भद्र! ज्येष्ठ मास की एकादशी को निर्जल व्रत करो। इस व्रत में केवल स्नान और आचमन के लिए जल ग्रहण कर सकते हो, लेकिन अन्न नहीं। अन्न खाने से व्रत खंडित हो जाता है। इस व्रत का पालन करने से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप और गौ दान अवश्य करना चाहिए।”
व्यासजी की सलाह मानकर भीमसेन ने निर्जला एकादशी का व्रत किया। व्रत के बाद सुबह होते-होते भीमसेन संज्ञाहीन हो गए। तब पांडवों ने उन्हें गंगाजल, तुलसी, चरणामृत, और प्रसाद देकर उनकी मूर्च्छा दूर की। इस व्रत के प्रभाव से भीमसेन पापमुक्त हो गए और स्वर्ग के अधिकारी बन गए।
निष्कर्ष
निर्जला एकादशी व्रत एक कठिन, लेकिन अत्यंत फलदायी व्रत है, जिसे करने से व्यक्ति को अपार पुण्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत के द्वारा व्यक्ति अपने जीवन में सभी पापों से मुक्ति पा सकता है और भगवान वासुदेव की कृपा का पात्र बन सकता है।
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