पितृ-विसर्जन अमावस्या का दिन हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन विशेष रूप से पितरों को समर्पित होता है। आश्विन माह की अमावस्या, जिसे पितृ-विसर्जन अमावस्या के नाम से जाना जाता है, इस दिन को एक पवित्र अवसर के रूप में मनाया जाता है, जहां पितरों की तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
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दीपक जलाने और भोजन अर्पण की परंपरा
इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा है शाम को दीप जलाना। दीप जलाने का आशय यह है कि पितरों का मार्ग आलोकित हो, ताकि वे बिना किसी कठिनाई के अपने स्थान पर वापस जा सकें। इसके साथ ही, दरवाजे पर पूड़ी, पकवान, और अन्य खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं। यह प्रतीकात्मक होता है कि पितर विदाई के समय भूखे न जाएं। यह भोजन उनके लिए एक विदाई भोज के रूप में होता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि वे तृप्त होकर वापस जाएं।
पितरों की तृप्ति के लिए दान और ब्राह्मण भोजन
पितृ-विसर्जन अमावस्या के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किए गए दान से पितर संतुष्ट होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। विशेषकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर पितरों की तृप्ति का आयोजन किया जाता है।
पिण्डदान की विशेष विधि
इस दिन पिण्डदान का भी विशेष महत्व होता है। सवा किलो जौ के आटे से सोलह पिण्ड बनाए जाते हैं, जिन्हें विभिन्न जीवों को अर्पित किया जाता है। इनमें से आठ पिण्ड गायों को, चार पिण्ड कुत्तों को और शेष कौओं को खिलाए जाते हैं। यह पिण्डदान पितरों की आत्मा को शांति और तृप्ति प्रदान करने का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि यह अनुष्ठान पितरों के मार्ग को सुगम बनाता है और उनके आशीर्वाद से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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पितृस्तोत्र का पाठ: पितरों की महिमा का गायन
पितृ-विसर्जन अमावस्या के दिन पितृस्तोत्र का पाठ करना भी अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृस्तोत्र में पितरों की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है और उनसे आशीर्वाद की कामना की जाती है। इस स्तोत्र में कहा गया है कि पितर इन्द्र, दक्ष, मारीचादि सप्तर्षि, मनु आदि जैसे महापुरुषों के पूर्वज हैं और उनकी कृपा से ही जीवन में शुभ फल प्राप्त होते हैं।
पितृस्तोत्र इस प्रकार है:
जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीचादि सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता हैं, कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ। जो मनु आदि राजर्षियों, मुनीश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी नमस्कार करता हूँ। नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और भूलोक तथा पृथ्वी के जो भी नेता हैं, उन पितरों को मैं जोड़कर प्रणाम करता हूँ। जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार हैं। मैं योगदृष्टि सम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ। चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ तथा अग्निस्वरूप अन्य पितरों को भी प्रणाम करता हूँ क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है। जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत् स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरों को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हों। इति श्री पितृस्तोत्र समाप्तम।
पितृस्तोत्र का सम्पूर्ण सार इस प्रकार है
पितृस्तोत्र में पितरों को न केवल हमारे पूर्वजों के रूप में देखा जाता है, बल्कि समस्त जगत के रचयिता के रूप में भी सम्मानित किया जाता है। वे देवताओं के भी पूर्वज हैं और उनका तेज सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि के रूप में प्रकट होता है। जो पितर ब्रह्मस्वरूप, योगी और समस्त लोकों के नेता हैं, उन्हें बार-बार नमन किया जाता है।
पितरों का आशीर्वाद
इस दिन यह विश्वास होता है कि पितर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाते हैं। इसलिए, पितृ-विसर्जन अमावस्या का यह पावन पर्व हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का सबसे उपयुक्त समय होता है। इस दिन किए गए अनुष्ठान और दान से पितर प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद जीवन में शांति और समृद्धि लाता है।
इस प्रकार, पितृ-विसर्जन अमावस्या न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति आभार और श्रद्धा प्रकट करने का एक विशेष अवसर है। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि हमारे जीवन की समृद्धि और सफलता में हमारे पितरों का योगदान कितना महत्वपूर्ण है।
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