सनातन धर्म में सर्पों का एक विशेष और उच्च स्थान है। वासुकि नाग को शिवजी ने अपने गले में धारण किया, और शेषनाग को श्री हरि ने क्षीरसागर में अपनी शय्या का स्थान दिया है। इसीलिए, भारतवर्ष में नागों की पूजा देवताओं की तरह की जाती है, और देश भर में अनेकों मंदिर व पूजा स्थल नागों को समर्पित हैं। हममें से कई लोग यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि सांप कहाँ से आए और उनसे जुड़े अनेक प्रश्न हमारे मन में उठते हैं। इन्हीं सवालों के उत्तर महाभारत के आदि पर्व से लेकर प्रस्तुत कर रहा हूँ।
दक्षप्रजापति की कन्याएं: कद्रु और विनता
सतयुग में दक्षप्रजापति की दो कन्याएं थीं—कद्रु और विनता। उनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ। ऋषि कश्यप अपनी धर्मपत्नियों की सेवा से प्रसन्न होकर बोले, “हे प्रिय, तुम दोनों ने मेरी बहुत सेवा की है, इसलिए तुम अपनी इच्छानुसार वर मांग लो।”
इस पर कद्रु ने कहा, “1000 तेजस्वी नाग मेरे पुत्र हों,” और विनता बोली, “तेज, बल, और शरीर में कद्रु के पुत्रों से श्रेष्ठ केवल दो ही पुत्र मुझे प्राप्त हों।” ऋषि कश्यप ने “तथास्तु” कहा और घने वन की गहराइयों में चले गए।
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सर्पों का जन्म और विनता की व्याकुलता
समय आने पर, कद्रु ने 1000 अंडे दिए और विनता ने 2 अंडे दिए। 500 वर्ष बीत जाने पर, कद्रु के 1000 पुत्र सर्पों के रूप में अंडों से बाहर आ गए, लेकिन विनता के अंडे वैसे ही थे। व्याकुलता में आकर विनता ने अपने हाथों से ही एक अंडा फोड़ दिया। उस अंडे से एक शिशु निकला, जिसका आधा शरीर पुष्ट हो चुका था लेकिन आधा शरीर अभी कमजोर और कच्चा था।
नवजात शिशु को अपनी माता के इस उतावलेपन पर बहुत क्रोध आया। शिशु ने अपनी माँ से कहा कि उसे इस प्रकार समय से पूर्व अंडा नहीं फोड़ना चाहिए था। उसने अपनी माँ को यह भी सलाह दी कि यदि वह अपने दूसरे पुत्र को तेजस्वी, अतिबलवान और अपराजित देखना चाहती है, तो 500 वर्षों तक और प्रतीक्षा करे, ताकि शिशु स्वयं ही अंडे से बाहर आए।
अरुण का सूर्यदेव का सारथी बनना
इतना कहकर विनता का प्रथम पुत्र, बालक अरुण, पूरे वेग से आकाश में उड़ गया और उसे सूर्यदेव के सारथी के रूप में स्थान मिला। इस बालक को “अरुण” के नाम से जाना जाता है, और पृथ्वी पर प्रातःकाल की सिंदूरी लालिमा अरुण देव की ही झलक मानी जाती है।
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गरुड़ का जन्म
जैसा कि अरुण ने अपनी माँ को कहा था, वैसा ही हुआ। 500 वर्षों तक और प्रतीक्षा करने के बाद, कश्यप ऋषि की पत्नी विनता के दूसरे पुत्र का अंडा 1000 वर्षों बाद स्वयं फूटा। उसमें से एक महाबली, सक्षम योद्धा के रूप में जो तेजस्वी पुत्र निकला, उसे आज समस्त लोक “गरुड़” के नाम से जानते हैं।
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