स्वस्तिक, 9 निधियाँ और ऋद्धि-सिद्धि का महत्व

स्वस्तिक, 9 निधियाँ और ऋद्धि-सिद्धि का महत्व

हिंदू परंपरा में स्वस्तिक का चिन्ह एक अत्यंत शुभ और पवित्र प्रतीक माना जाता है। इसे विशेष रूप से शुभ अवसरों, जैसे विवाह, धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ या नए काम की शुरुआत पर बनाया जाता है। लेकिन इसके साथ ही, हमारे सनातन धर्म में नौ निधियों और ऋद्धि-सिद्धियों का भी महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है, जिन्हें अक्सर हम सुनते हैं। तो आइए, आज हम इन सभी का गहराई से अर्थ और महत्व समझते हैं।

इसे जरूर पढ़ें: पंच-देवों की पूजा और हिन्दू धर्म के मुख्य नियम

क्या हैं ऋद्धि एवं सिद्धियाँ?

भगवान गणेश को ऋद्धि और सिद्धियों का दाता माना जाता है। ये विशेष शक्तियाँ व्यक्ति को जीवन में सफलता और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करती हैं। आठ प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ ऐसी शक्तियाँ हैं, जो योगाभ्यास और साधना से प्राप्त होती हैं। ये शक्तियाँ व्यक्ति के भीतर आत्मिक और मानसिक सामर्थ्य को जाग्रत करती हैं। आइए, इन आठ ऋद्धि-सिद्धियों को समझते हैं:

  1. परखने की शक्ति: यह शक्ति व्यक्ति को सही और गलत का भेद करने में सक्षम बनाती है।
  2. निर्णय लेने की शक्ति: सही समय पर सटीक निर्णय लेने की क्षमता।
  3. सामना करने की शक्ति: चुनौतियों का डटकर सामना करने की क्षमता।
  4. सहन करने की शक्ति: कठिन परिस्थितियों में धैर्य और सहनशीलता बनाए रखने की शक्ति।
  5. सहयोग करने की शक्ति: दूसरों के साथ मिलकर कार्य करने और सहयोग देने की क्षमता।
  6. विस्तार को संकुचित करने की शक्ति: किसी चीज़ को उसकी सीमाओं में लाने और नियंत्रण में रखने की शक्ति।
  7. समेटने की शक्ति: अपने भीतर शक्ति और सामर्थ्य को संचित करने की क्षमता।
  8. समाने (निहित हो जाने) की शक्ति: किसी स्थिति या परिस्थिति में खुद को ढालने और समर्पित करने की क्षमता।

इसे जरूर पढ़ें: रामेश्वरम: भारत के 4 धामों और 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक

नौ निधियाँ

नौ निधियाँ उन गुणों का संग्रह हैं, जिनसे व्यक्ति का जीवन पूर्ण और संतुष्ट हो सकता है। ये नौ निधियाँ आध्यात्मिक और मानसिक संपन्नता का प्रतीक हैं:

  1. सुख: शारीरिक और मानसिक संतोष।
  2. शांति: मानसिक और आत्मिक शांति।
  3. पवित्रता: शुद्धता और नैतिकता।
  4. ज्ञान: सही और गलत की समझ।
  5. प्रेम: दयालुता और करुणा से भरा हृदय।
  6. आनंद: जीवन की हर स्थिति में खुशी का अनुभव।
  7. संतोष: जितना है, उसमें खुश और संतुष्ट रहना।
  8. धैर्य: कठिनाइयों का सामना धैर्यपूर्वक करना।
  9. दया-भावना: दूसरों के प्रति करुणा और संवेदनशीलता।

स्वस्तिक का महत्व

स्वस्तिक का अर्थ है “शुभ” और “आनंदकारी”। यह चिन्ह भगवान गणेश के समान ही शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। पूजा-अर्चना के दौरान यदि गणेशजी की मूर्ति या सुपारी उपलब्ध न हो, तो स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर गणपति का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की जाती है।

स्वस्तिक की पूजा से नकारात्मकता दूर होकर जीवन में शुभता का आगमन होता है। इसके प्रभाव से विपरीत परिस्थितियाँ अनुकूल बन जाती हैं, हानि लाभ में बदल जाती है और पराजय के स्थान पर विजय प्राप्त होती है। इस प्रकार स्वस्तिक का चिन्ह हमारे जीवन में शुभता, समृद्धि और सफलता का प्रतीक है।

इसे जरूर पढ़ें: राशि अनुसार मंत्र जाप

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। यह सामग्री विभिन्न स्रोतों से संकलित की गई है और इसे केवल जानकारी के रूप में लिया जाना चाहिए। ये सभी बातें मान्यताओं पर आधारित है | adhyatmiaura.in इसकी पुष्टि नहीं करता |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow Us On Social Media

भाग्य खुलने के गुप्त संकेत